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Saturday, 11 February 2017

वीरांगना आशादेवी गुर्जराणी -1857 विद्रोह की महानायिका /Veerangna Asha Devi Gurjarani

शहीद वीरांगना आशादेवी गुर्जराणी - Veerangna Asha Devi Gurjarani

1857 Revoution of India | First War of Independence | Meerut | Muzaffarnagar | Kotwal Dhan singh GurjarSaheed Asha Devi Gujari | 1857 Revolt | Uttarpradesh | Mutiny | British 
Veerangna Ashadevi Gujarani - 1857 Revoution of India


भारत माँ को अपने सपूतों पर गर्व हैं, जिन्होंने उनकी मर्यादा की रक्षा के लिए अपना सर्वस्व लूटा दिया। इतिहास में ऐसे कई लाल हुए हैं, जिन्होंने अपनी जान से भी अधिक महत्व इस देश की आजादी को दिया। यही कारण है कि कृतज्ञ भारत उन्हें हमेशा याद रखता आया है और आगे भी रखेगा।भारतीयों ने ब्रितानियों की दासता से मुक्ति प्राप्त करने हेतु सर्वप्रथम प्रयास 1857 ईं. में किया था, जिसे प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के नाम से भी जाना जाता है।  इस गदर की शुरूआत मेरठ से दस मई 1857 को कोतवाल धनसिहँ गुर्जर ने की ।

 अँग्रेज़ी सत्ता को नष्ट करने का पहला समूल प्रयास 1857 ई. में ही हुआ था, जिसमें न केवल क्रांतिकारियों ने अपितु भारतीय जनता ने भी खुलकर भाग लिया था। अँग्रेज़ और कुछ भारतीय चाटुकार इतिहासकार भले ही अपनी संतुष्टि के लिए सिपाही विद्रोह मानते हों, परंतु वास्तव में यह जन मानस का विद्रोह था। इसमें असंख्य लोग मारे गए। कुछ को भयंकर यातनाएँ दी गई, कुछ को ज़िंदा अग्नि देव का भेंट चढ़ा दिया गया, परंतु भारत भूमि इससे विचलित नहीं हुई।

जिन महानतम विभूतियों ने जीवन पर्यंत याद किया जाता है उनमें से एक थी मुजफ्फरनगर की कल्श्सान कुल की वीरांगना आशादेवी गुर्जराणी है।पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मुजफ्फनगर( अब शामली जिला ) के कल्श्सान खाप की वीर युवती  ( जन्म - 1829 ) का मानना था कि आजादी की लडाई मे सिर्फ सैनिको का लडना ही काफी नही है बल्कि समाज के हर तबके के लोगो को कंधे से कंधा मिलाकर जंगे आजादी मे शामिल होना चाहिए  । इस क्रान्तिकारी सोच के तहत गुर्जरो के गाव की इस साधारण सी गुर्जर महिला ने महिलाओ को सगठित कर अपनी सैना बना ली  । 

1857 के संग्राम मे उस वीरांगना युवती ने अग्रेजो को काफी मश्किलो मे डाला ओर आस - पास के क्षेत्रो मे अपना दबदबा कायम  करलिया ।
आशादेवी गुर्जराणी के संगठन की ताकत का अंदाजा इस बात से ही लगाया जा सकता हे कि सगठन की 250 महिला सैनिको की शहादत के बाद ही अग्रेज सेना आशादैवी को युद्धभूमि मे जिन्दा पकड सकी थी  । ग्यारह अन्य महिला सैनिको के साथ बर्बर अग्रेजो ने आशादेवी को फासी पर लटका दिया  । अपनी बहादुरी से सोये हुए भारत मे शोर्य ओर पराक्रम का आशादेवी गुर्जराणी ने एक बार फिर नया सचांर किया । 

Veerangna Asha Devi Gujari / वीरांगना आशा देवी गुर्जराणी

सन्दर्भ :--

सुरेश नीरव,  कादम्बिनी : 
अगस्त - 2006 पृष्ट - 82



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Monday, 2 January 2017

शहीद झंडु सिंह नंबरदार 1857 | Saheed Jhandu Singh Nambardar - Great Freedom Fighter of 1857 Revolt

शहीद झंडु सिंह नंबरदार 1857 | Saheed Jhandu Singh Nambardar - Great Freedom Fighter of 1857 Revolt


शहीद झंडु सिंह नंबरदार 1857 | Saheed Jhandu Singh Nambardar - Great Freedom Fighter of 1857 Revolt


10 मई 1857 को मेरठ में क्रान्ति के विस्फोट के बाद मेरठ के आस-पास स्थित गुर्जरो के गांवों ने अंग्रेजी राज की धज्जिया उड़ा दी। अंग्रेजों ने सबसे पहले उन गांवों को सजा देने पर विचार किया जिन्होंने 10 मई की रात को मेरठ में क्रान्ति में बढ़ चढ़कर भाग लिया था और उसके बाद मेरठ के बाहर जाने वाले आगरा, दिल्ली आदि मार्गो को पूरी तरह से रेाक दिया था। जिसकी वजह से मेरठ का सम्पर्क अन्य केन्द्रों से कट गया था। इस क्रम में सबसे पहले 24 मई को 'इख्तयारपुर' पर और उसके तुरन्त बाद 3 जून को 'लिसाड़ी' , 'नूर नगर' और 'गगोल गांव' पर अंग्रेजों ने हमला किया। ये तीनों गांव मेरठ के दक्षिण में स्थित 3 से 6 मील की दूरी पर स्थित थे। लिसारी और नूरनगर तो अब मेरठ महानगर का हिस्सा बन गए हैं। गगोल प्राचीन काल में श्रषि विष्वामित्र की तप स्थली रहा है और इसका पौराणिक महत्व है।  नूरनगर, लिसाड़ी और गगोल के किसान उन क्रान्तिवीरों में से थे जो 10 मई 1857 की रात को घाट, पांचली, नंगला आदि के किसानों के साथ कोतवाल धनसिंह गुर्जर के बुलावे पर मेरठ पहुँचे थे। अंग्रेजी दस्तावेजों से यह साबित हो गया है कि धनसिंह कोतवाल के नेतृत्व में सदर कोतवाली की पुलिस और इन किसनों ने क्रान्तिकारी घटनाओं का अंजाम दिया था। इन किसानों ने कैण्ट और सदर में भारी तबाही मचाने के बाद रात 2 बजे मेरठ की नई जेल तोड़ कर 839 कैदियों को रिहा कर दिया। 10 मई 1857 को सैनिक विद्रोह के साथ-साथ हुए इस आम जनता के विद्रोह से अंग्रेज ऐसे हतप्रभ रह गए कि उन्होंने अपने आप को मेरठ स्थित दमदमें में बन्द कर लिया। वह यह तक न जान सके विद्रोही सैनिक किस ओर गए हैं ?  इस घटना के बाद नूरनगर, लिसाड़ी, और गगोल के क्रान्तिकारियों बुलन्दशहर आगरा रोड़ को रोक दिया और डाक व्यवस्था भंग कर दी। आगरा उस समय उत्तरपश्चिम प्रांत की राजधानी थी। अंग्रेज आगरा से सम्पर्क टूट जाने से बहुत परेषान हुए। गगोल आदि गाँवों के इन क्रान्तिकारियों का नेतृत्व गगोल के झण्डा सिंह गुर्जर उर्फ झण्डू दादा कर रहे थे। उनके नेतृत्व में क्रान्तिकारियों ने बिजली बम्बे के पास अंग्रेज़ी  सेना के एक कैम्प को ध्वस्त कर दिया था। आखिरकार 3 जून को अंग्रेजो ने नूरनगर लिसाड़ी और गगोल पर हमला बोला। अंग्रेजी सेना के पास काराबाइने थी और उसका नेतृत्व टर्नबुल कर रहा था। मेरठ शहर के कोतवाल बिशन सिंह, जो कि रेवाड़ी के क्रान्तिकारी नेता राजा तुलाराव का भाई था, को अंग्रेजी सेना को गाईड का काम करना था। परन्तु वह भी क्रान्ति के प्रभाव में आ चुका था। उसने गगोल पर होने वाले हमले की खबर वहां पहुँचा दी और जानबूझ कर अंग्रेजी सेना के पास देर से पहुँचा। इसका नतीजा भारतीयों के हक में रहा, जब यह सेना गगोल पहुँची तो सभी ग्रामीण वहाँ से भाग चुके थे। अंग्रेजो ने पूरे गाँव को आग लगा दी। बिशन सिंह भी सजा से बचने के लिए नारनौल, हरियाणा भाग गए जहाँ वे अग्रेजों से लड़ते हुए शहीद हो गए।कुछ दिन बाद अंग्रेजों ने फिर से गगोल पर हमला किया और बगावत करने के आरोप में 9 लोग रामसहाय, घसीटा सिंह, रम्मन सिंह, हरजस सिंह, हिम्मत सिंह, कढेरा सिंह, शिब्बा सिंह बैरम और दरबा सिंह को गिरफ्तार कर लिया। इन क्रान्तिवीरों पर राजद्रोह का मुकदमा चला और दषहरे के दिन इन 9 क्रान्तिकारियों को चैराहे पर फांसी से लटका दिया गया। तब से लेकर आज तक गगोल गांव में लोग दशहरा नहीं मनाते हैं। इन शहीदों की याद में गांववासियों ने, 1857 की क्रान्ति के गवाह के रूप में आज भी उपस्थित प्राचीन पीपल के पेड़ के नीचे, एक देवस्थान बना रखा है। जहाँ दशहरे के दिन अपने बलिदानी पूर्वजों को श्रद्धापूर्वक याद करते हैं। सरकार आज भी इस ओर से उदासीन है गगोल में न कोई सरकारी स्मारक है न ही कोई ऐसा सरकारी महाविद्यालय, अस्पताल आदि हैं जो इन शहीदों को समर्पित हो।
Jhandu Singh Gurjar Nambardar - 1857 revolution


                                                                                                  संदर्भ


1. डनलप, सर्विस एण्ड एडवैन्चर आफ खाकी रिसाला इन इण्डिया इन 1857-58।
2. नैरेटिव आफ इवैनटस अटैन्डिग दि आउटब्रेक आफ डिस्टरबैन्सिस एण्ड रैस्टोरेशन आफ अथारिटी इन दि डिस्ट्रिक्ट आफ मेरठ इन 1857-58
3. एरिक स्ट्रोक, पीजेन्ट आम्र्ड।
4. एस0 ए0 ए0 रिजवी, फीड स्ट्रगल इन उत्तर प्रदेश  खण्ड-5
5. ई0 बी0 जोशी, मेरठ डिस्ट्रिक्ट गजेटेयर।
6. आचार्य दीपांकर, स्वाधीनता संग्राम और मेरठ, जनमत प्रकाशन, मेरठ 1993





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Thursday, 19 May 2016

शहीद सूबा देवहंस कसाना गुर्जर / Suba Devhansh Kasana Gurjar

अमर शहीद - सूबा देवहंस कसाना गुर्जर 

Suba Devhansh Kasana Gurjar - A Great Freedom Fighter 

देवहंस के पिता का नाम बीजासिंह गुर्जर था। इनका गांव कुदिन्ना राजस्थान के धौलपुर तथा बाड़ी के बीच तालाब शाही से 3 मील पूर्व की ओर धनी के बीच बसा हुआ है। यह कसाने गोत्र के गूर्जरों का गांव है। आगरा के सैयद से लेकर शिवपुरी के सवनवादा और नरवर तक तथा भिण्ड जिले के गुरीखा गांव से लेकर दतिया की तलहटी तक गूर्जराधार का इलाका कहलाता है। मुरैना जिले का पूर्व नाम तंवरधार और इससे लगा इलाका भदावर कहलाता है। इस प्रकार जिला मुरैना, ग्वालियर, भिण्ड, शिवपुरी, दतिया जिला (मध्य प्रदेश) के तमाम गांव जातीय बाहुल्यता के कारण गूर्जरधारा कहलाते हैं। प्रादेशिक सीमाएं (उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्य प्रदेश) इन के सामाजिक संगठन और गुर्जर संस्कृति के मार्ग में बाधा नहीं है। देवहसं के गोत्र कसाना के सौगांव इस गूजरधार के अन्र्तगत आते हैं।

कुदिन्ना गांव वर्तमान धौलपुर (राजस्थान) जिले के अन्र्तगत है। किन्तु इसका परिवेश उत्तर प्रदेश के आगरा, मध्य प्रदेश के मुरैना, ग्वालियर, शिवपुरी, भिण्ड, दतिया के गूजराधारा से निर्मित है। गूजराधार का क्षेत्र अधिकतर पहाड़ी, उबड़-खाबड़ तथा घने जंगलों से आच्छादित है। गूजरों का जब राजनैतिक पतन हुआ तो ये जंगलों, बीहड़ों में सिर छिपाने चले गये गये और अपनी खोई हुई शक्ति को बटोरने लगे लेकिन इन्होने सिर झुकाना पसन्द नहीं किया । पंद्रहवीं शताब्दी में यवनों के तूफानी आक्रमणों से इस क्षेत्र के गुर्जरों ने टक्कर ली थी छापामार युद्ध पद्धति गुर्जरों की खोज है जिसे कालान्तर में शिवाजी ने कुछ परिष्कृत करके निजामशाही आदिलशाही, मुगलशाही तथा कुतुबशाही से डटकर टक्कर ली थी और हिन्द स्वराज की स्थापना की थी । यही कुदिन्ना गांव मुगलिग हकूमत के दौरान लड़ाकू गुर्जरों का केन्द्र था। मुरैना के बमरौली, इटावली , टिक्होली, घुरैया बसई चैखेटी और मृगनयनी की गंाव रोराराई भी लड़ाकू गुर्जरों के केन्द्र थे । इन गांवों में कसाने, कोरी, तोमर, छावड़ी, घुरया, मावई व चन्देले गोत्र के गुर्जरों का प्रभुत्व तथा बाहुल्य है।

देवहंस का जन्म चैतवदी आठे सम्वत 1869 की रात को हुआ था। ये बीजासिंह की चौथी संतान थे । बीजासिंह की आर्थिक स्थिति अति सामान्य थी। बाड़ी के पुरोहित ने बिना दक्षिणा के ग्रहराशि व नाम बताने से इंकार कर दिया था। बीजासिंह ने स्वयं अपने इस बेटे का नाम देवहंस रखा । इससे पहले लड़के का नाम रामहंस था। बीजासिंह के पास गाय भैंसे बहुत थी। एक बार इन्होने अपनी 10 भैंसे व 3 गायों की रक्षा हेतु शेर को मार डाला था। शेरनी ने इस का बदला लेने के लिए बीजासिंह पर हमला किया उसे भी यमलोक पहुंचा दिया । बीजासिंह की वीरता की कहानी की चर्चा सारे क्षेत्र में फैल गई तालाबशाही के पठान हैदरखां ने बीजासिंह का सम्मान किया और उसे तलवार भेंट में दी । देवहंस उस समय दुधमुंहा शिशु था लेकिन उसके हृदय में अपने पिता की वीरता की छाप उसी समय से अंकित हो गई थी ।

देवहंस जब एक वर्ष के थे । इनकी मां बाजरे के खेत में काम कर रही थी। देवहंस को खेत की मेढ़ पर डलिया में बिछौना कर सुला कर खेत में बीजासिंह व उनकी पत्नी खटानी व्यस्त हो गये । रामहंस 5 वर्ष का था उसे देखभाल को छोड़ गये । रामहंस खेलता हुा दूसरे मेंढ़ तक चला गया । मां की नजर जब देवहंस की तरफ गई तो रामहंस नजर नहीं आया। वह दौड़ कर देवहंस को देखने आई तो देखा कि देवहंस एक विशैले नाग से खेल रहा है। नाग फन फैलाये देवहंस से खेल रहा है बच्चा खुशी से किलकारी मार रहा है। खटानी गूजरी सहम गई और उसने बीजासिंह को बुलाया । वह भी इस अदभूत दृश्य को देखकर हत्प्रभ रह गये । दोनों ने अपने इष्टदेव का स्मरण किया और नागदेवता आलोप हो गया ।
बीजासिंह ने भविष्यवाणी की यदि बच्चा जी गया तो धरती पर राज करेगा । बच्चे पर नागदेव की विशेष कृपा है। कौन जानता था कि बाप की भविष्यवाणी एक दिन सच साबित होगी और देवहंस एक क्रान्तिकारी देशभक्त योद्धा बनेगा ।
देवहंस जब 8-10 वर्ष के थे खेल रहे थे । प्रसिद्ध ज्योतिषी उल्लिका मिश्र कहीं से पधारे थे । वे बच्चों के खेल को देख रहे थे । देवा इस खेल में विजयी रहा । होनहार विरवान को होते चिकने पात । देवहंस को देखकर ज्योतिषी मिश्र ने भविष्यवाणी की, यह बालक भाग्यशाली है एक दिन बिना तिलक का राजा बनेगा । मिश्र जी तीन दिन कुदिन्ना गांव में ठहरे और भावी सूवा देवहंस की जन्मपत्री बनाकर बीजासिंह को दे दी । ग्राम निवासियों के स्वप्न में भी देवहंस के राजा बनने की कल्पना तक नहीं थी और मिश्रजी को लोगों ने ठग समझा यह कर मजाक उड़ाया कि बीजासिंह के घर में बीज तक तो है नहीं राजा बनेगा इसका छोरा पुरूष के भाग्य का किस को पता है।

देवहंस जब बारहवर्ष के हुए तो अपने घरेलू काम धंधे में पिता का हाथ बंटाने लगे । गाय भैंसों को चराने का काम इन्हें पसन्द आया । दिन भर जंगल में खेलकूद, कुश्ती और ग्रामीण गाने गाते रहते । थोड़े ही दिन में ग्वालों की एक गायक टोली बना ली जो देवा की टोली के नाम से मशहूर हो गई । तालाबशाही में हैदरखां पठान के पास आगरे का मशहूर मल्ल चन्दू रहता था। उससे देवा ने मल्ल विद्या, लाठी, बनैती की कला सीखी और देवहंस की बाड़ी, बरोड़ी , धौलपुर, राजाखेड़ा, सेंपऊ-आगरा, मथुरा के दंगलेां में कुश्ती लड़ने की धाक जम गई । तालाबशाही पर गायन के आयोजनों में भी उसे गान विद्या में प्रसिद्ध कर दिया । वह अपने इष्ट बाबू महाराज के भजन गाता था। लोग उसके भजन सुन कर मुग्ध हो जाते थे ।
वह हर वर्ष बाड़ी के बारह भाईयों के मेले में जाता था । वहंा पर भी वह बाबू महाराज के गीत सुनाया करता था। अब देवहंस प्रसिद्ध पहलवान और लोकप्रिय गायक के रूप में जाना जाने लगा था ।
आसपास के ग्रामीण शेर और चीतों द्वारा उनके पशुओं के वध के कारण बहुत आंतकित और परेशान हो गए थे । देवहंस ने आखेट करना शुरू थोड़ी उम्र से हीे कर दिया था । जब कोई शेर किसी पशु को मार खाता तो ग्रामीण देव के पास
पहुंचते थे और देवा जब तक शेर या चीते का वध न कर देता तब तक दम नहीं लेता था। उसने अपनी ग्वालियों की टोली के साथ मिलकर एक नहीं अनेक शेर और चीतों का वध करके किसानों के दुधारू और उपयोगी पशुओं की रक्षा की जिससे देवा का यश सारे क्षेत्र में फैल गया । देवा की बहादुरी की प्रशंसा सुनकर एक बार लाट साहब ने देवा को तालाब शाही पर बुलवाया था और देवा से मिलकर प्रसन्नता प्रगट की थी ।

बाड़ी के मेले में देवा बाबू महाराज के भजन गा रहा था। हजारों की भीड़ अपने इष्ट देव बाबू महाराज की जय के नारे लगा रही थी। तभी धौलपुर नरेश राणा भगवत सिंह अपनी रानी के साथ हाथी पर सवार वहां से गुजरे लेकिन भीड़ ने राजा के स्वागत करने की बजाये देवा के भजन सुनने में दतचित रहे । राजा व रानी देवा के भजन सुनकर सम्मोहित से हो गए और दोनों ने बीजासिंह से इस किशोर को अपने साथ धौलपुर ले जाने का आग्रह जिसे बीजासिंह ने भविष्यवाणी के आधार पर स्वीकार कर लिया और देवहंस अब कुदिन्ना की झोपड़ी से धौलपुर के महलों में पहुंच गए ।

राणा भगवत सिंह और रानी भवाजू देवहंस को अपने महलों में ले आए और उन्होने सरकारी फरमान जारी किया कि देवहंस को राज दरबार का कवि व गायक बनाया जाता है। देवहंस के शरीर सौष्टव व वीरता की प्रशंसा सुनकर राणा ने उसे अंग्रेंजी फौज में भर्ती कराके प्रशिक्षण दिलाया । अंग्रेंजों को यह मालूम नहीं था कि यह सैनिक टेªनिंग लेकर 1857 ई0 में आगरे क्षेत्र से उनके राज्य को समाप्त कर देगा । धौलपुर के राणा भगवत सिंह ने अपनी फौज का उसे सर्वोच्च सेनापति बना दिया। देवहंस ने अश्वारोही दल बढ़ा कर फौजी छावनी का रूप दे दिया और देवहंस टंटकोर नामक की अलग ट्रांसपोर्ट कमान कायम की । जिसे धौलपुर के अंग्रेंज पोलिटिकल ऐजेंट ने वेलेजली की सहायक प्रथा नीति के विरूद्ध माना था। जिसकी शिकायत उसने बड़े लाट साहब से की थी ।

राणा भगवतसिंह व देवहंस करौली देवी के दर्शन करके झिरी के बाग में पड़ाव डाले हुए थे । झिरी सरमथुरा के राजा ने दोस्ती करने के लिए राणा और देवहंस को दावत पर बुलाया । झिरी सरमथुरा के राजा राणा को चान्दी के थाल में भोजन परोसा और देवहंस को पातर में परोसा । इस गलत व्यवहार पर राणा भगवत सिंह ने आपति की तो सरमथुरा के राजा ने जवाब दिया हमारे यहंा गूजरों को ऐसे ही खिलाते हैं। देवहंस ने भोजन के ग्रास को माथे लगाकर कहा, तुम्हें एक दिन ऐसे ही खिलाउंगा । देवहंस और राणा वापिस आ गए । इस तौहीन का कुप्रभाव सारी गूजराधार पर पड़ा। देवहंस ने छः महीने में गूजरों की विशेष फौज तैयार की उसे प्रशिक्षण देकरर धौलपुर की फौज साथ लेकर सरमथुरा पर धावा बोल दिया । किले को ध्वस्त करके धूल में मिला दिया और राजा को खम्बे से बांध कर पातर में खाना परोस कर पूछा गूजरों को कैसे खाना खिलाते हैं और उसे कैद करके धौलपुर नरेश के पिता कीर्तिसिंह की पाग के साथ (जो इन्होने कभी रख ली थी और मालगुजारी देने से भी मना कर दिया था) धौलपुर के राणा भगवत सिंह के सम्मुख पेश कर दिया था। झिरी सरमथुरा के किले की किवाड़ उतार लाए थे जो बाद में इन्होने अपने किले देवहंस गढ़ में लगाए गए थे जो आज भी देवहंस की विजय गाथा के प्रतीक हैं।

झिरी सरमथुरा की विजय के पश्चात राणा भगवतसिंह ने देवहंस को धौलपुर राज्य का सूबा नियुक्त किया और धौलपुर रियासत के जागीरदारों ने सर्वोच्च स्थान दिया । ग्राम डरेरा, बागधर, सहेड़ी तथा सामलिया का पूरा की जागीर बतौर वीरोचित सम्मान में दी, जो गांव सरमथुरा से जीते थे वे भी उसे ही दे दिए गए । धौलपुर में देवहंस का राजकीय सम्मान किया गया। दीपावली के त्यौहार की तरह दीप जलाए गए । देवहंस धौलपुर का दीवान और अपनी जागीर का राजा बन गया और उसके पिता बीजासिंह उल्लिका मिश्र की भविष्यवाणी सच हो गई और वह सूबा देवहंस के नाम से प्रसिद्ध हो गया ।

सूबा देवहंस ने देवहंसगढ़ नामका किला बनाया जो धौलपुर से लगभग 15 मील दूर है। किला बहुत भव्य एवं सुन्दर है। किले का मुख्य द्वार मुगलकालीन जैसा है परन्तु उसकी बनावट भारतीय हिन्दू किलों के समान है। द्वार पर द्वारपालों के लिए प्रकोष्ट बने हैं। इस द्वार के उपर पंचखंडा महल जो दरबार हाल रहा होगा । दुर्ग लाल पत्थर का बना है, खम्भों पर नक्काशी शहतीर डालकर पटिटयों से छत बनाई गई है। शिल्पकला देखते ही बनती है। सारे चैक में चैकोर बावड़ी है जिसमें पानी भरा हुआ है। इस चैक से लगी के बाद एक तीन हवेली है जो रनिवास और रहवास के लिए काम में लाई जाती थी हवेली के अन्दर अनाज के लिए पत्थर की कोठी बनी हुई है। किले की चारदीवारी 20 फुट चैड़ी हैं चारों और गुम्बज है। किले के पश्चिम में अर्ध कलाकार एक लम्बा चैड़ा खाल है जिसे उतर पूर्व की ओर बांध की तरह बांधा है। इसमें पानी भरा रहता था। पूर्व की ओर भी एक तालाब है। दक्षिण का भाग खुला है। सामरिक दृष्टि से सूबा देवहंस का किला बहुत महत्वपूर्ण है। यह किला देवहंस के गांव कुदिन्नना से लगभग 3 मील दूर है।

देवहंस ने 1857 की क्रान्ति में बढ़ चढ़ कर भाग लिया था। आगरा जिले की 3/4 तहसीलों पर अधिकार करके इस क्षेत्र में अंग्रेंजी राज को समाप्त सा कर दिया था। दमनचक्र के दौरान अंग्रेज हकूमत ने अपने वफादार जमीदार हर नारायण की सहायता लेकर देवहंस को हराना चाहा मगर उसे स्वयं नीचा देखना पड़ा । इस लड़ाई में 3000 बन्दूकें, 2 स्टेनगन तथा 2 लाख की सम्पति सूबा देवहंस के हाथ लगी । इण्डियन एम्पायर के लेखक मार्टिन्स ने इस सम्बन्ध में लिखा है गुर्जरों के सिवाय हिन्दू जनता में किसी ने भी विद्रोहियों का साथ नहीं दिया । विद्रोह की आग घंटों में आगरा से दिल्ली , सहारनपुर, बुलन्दशहर तक सामूहिक रूप से फैल गई । धौलपुर के सूबा देवहंस ने आगरे की तहसीलों पर कब्जा कर लिया ।





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शहीद दरियाव सिंह गुर्जर - 1857 क्रान्ति के महानायक / Saheed Dariyaav Singh Gurjar

1857 क्रान्ति के महानायक अमर शहीद दरियावसिंह नागर गुर्जर

Dariyaav Singh Gurjar - A Great Freedom Fighter of 1857 Revolt 
दरियाव सिंह गुर्जर बहुत ही वीर,साहसी थे इनके डर के चलते अंग्रेजी सेना भी इलाके में नही आती थी। ये नागर (नांगडी) गौत्र के वीर गुर्जर थे।इनका जन्म दनकौर (उ.प्र) के निकट ग्राम जुनैदपुर मे हुआ था। जो अब वर्तमान मे ग्रेटर नौएडा क्षेत्र मे आता है।
 और 1857 के महानायको मे से एक थे। बुलन्दशहर के काले आम का खूनी दांश्ता को भला कौन नही जानता। जिसपर सैकडो वीर गुर्जरो को लटकाया गया। उस खुनी संग्राम मे एक नाम दरियाव सिंह गुर्जर का भी था । इनके नेत्रत्व मे आसपास के ग्रामीणो गुर्जरो ने अंग्रेजी सैना से लगातार कई दिन युध्द किए और अंग्रेजी हुकुमत से अपना लोहा मनवाया। इनके गाँव जुनैदपुर के ठीक सामने कई अंग्रेजो की कोठीयाँ और किले बने थे जो आज भी मौजूद है।लेकिन दरियाव सिंह गुर्जर के खौफ से अंग्रेजो की इलाके मे घुसने की भी हिम्मत नही होती थी । दरियाव सिंह की 1857 के स्वतंत्रा संग्राम मे महत्वपूर्ण भूमिका रही थी।10 मई को मेरठ से 1857 की जन-क्रान्ति की शुरूआत कोतवाल धनसिंह गुर्जर द्वारा हो चुकी थी । दरियाव सिंह और उनके नेत्रत्व मे ग्रामीण क्रांतिकारियों ने 1857 के गदर मे अंग्रेजी हुकुमत के छक्के छुड़ा दिए थे।तत्कालीन राष्टृीय भावना से ओतप्रोत दरियाव सिंह गुर्जर ने आसपास के ग्रामीणो को प्रेरित किया। दूसरी तरफ दादरी रिसायत के राजा उमरावसिंह गुर्जर ने भी आसपास के सभी गाँव के ग्रामीणो को एकत्र करलिया था और फिर गुर्जरो ने 12 मई 1857 को सिकन्द्राबाद तहसील पर धावा बोल दिया। वहाँ के हथ्यार और खजानो को अपने अधिकार मे कर लिया। इसकी सूचना मिलते ही बुलन्दशहर से सिटी मजिस्ट्रेट सैनिक बल सिक्नद्राबाद पहुँच गया। और दरियाव सिंह और उनकी क्रान्तिकारी सैना ने अंग्रेजो की काफी जनहानी की। लेकिन दरियाव सिंह गुर्जर समेत पांच वीर गुर्जर पकडे गये। उनको बंदी बना लिया गया और 14 मई 1857 को बुलंदशहर में काला आम पर फांसी दी गई। लेकिन ये खुनी जंग यहा नही रूकी। उसके बाद भी 7 दिन तक क्रान्तिकारी सैना ने उमराव सिंह गुर्जर के नेत्रत्व अंग्रेज सैना से ट्क्कर लेती रही । अंत मे 19 मई को सश्स्त्र सैना के सामने क्रान्तिकारी वीरो को हथियार डालने पडे 46 लोगो को बंदी बनाया गया । उमरावसिंह गुर्जर बच निकले । इस क्रान्तिकारी सैना मे गुर्जर समुदाय की मुख्य भूमिका होने के कारण उन्हे ब्रिटिश सत्ता का कोप भोजन होना पडा।उमरावसिंह गुर्जर अपने दल के साथ 21 मई को बुलन्दशहर पहुचे एवं जिला कारागार पर घावा बोलकर अपने सभी राजबंदियो को छुडा लिया । बुलन्दशहर से अंग्रेजी शासन समाप्त होने के बिंदु पर था लेकिन बाहर से सैना की मदद आ जाने से यह संभव नही हो सका 
हिंडन नदी के तट पर 30 व 31 मई को क्रान्तिकारी सैना और अंग्रेजी सैना के बीच एक ऐतिहासिक भीषण युद्ध हुआ। जिसकी कमान क्रान्तिनायक धनसिहँ गुर्जर, राव उमराव सिहँ गुर्जर, राव रोशन सिहँ गुर्जर व दरियाव सिंह गुर्जर के हाथ मे थी। इस युद्ध में अंग्रेजो को मुहँ की खानी पडी थी।
26 सितम्बर, 1857 को कासना-सुरजपुर के बीच उमरावसिंह की अंग्रेजी सैना से भारी टक्कर हुई । लेकिन दिल्ली के पतन और बाकी राज्यो के क्रान्ति मे हिस्सा ने लेने के कारण क्रान्तिकारी सैना का उत्साह भंग हो चुका था । भारी जन हानी के बाद क्रान्तिकारी सैना ने पराजय श्वीकार करली । उमरावसिंह गुर्जर को गिरफ्तार कर लिया गया । इस जनक्रान्ति के विफल हो जाने पर बुलंदशहर के काले आम पर 
80 वीर गुर्जर और उनकी नेत्र्तव मे हजारो क्रान्तिकारी शहीद हुए इनमे किसी को हाथी के पैर से कुचलवाया तो किसी को फांसी पर लटकाया । राजा राव उमराव सिहँ गुर्जर, राव रोशन सिहँ गुर्जर, राव बिशन सिहँ गुर्जर और सैकडो वीरो को भी बुलन्दशहर मे कालेआम के चौहराहे पर फाँसी पर लटका दिया गया ।

वर्तमान मे दरियाव सिंह गुर्जर के नाम से चौक बनाया गया है। और उनके नाम रोड का नामकरण किया गया है। (दरियाव सिंह गुर्जर मार्ग) और हर साल इनके नाम से बडे स्तर पर कुश्ती और मेले का आयोजन होता है। और उस वक्त जगह जगह इनके पोस्टर छपे हुए आप देख सकते है। ये बहुत ही अच्छा कार्य हुआ है 
इन वीर शहीदो के बारे मे कुछ इतिहासकारो को छोडकर ,किसी ने लिखने का कष्ट नही किया । यह हमारे देश का दुर्भाग्य है कि इन शहीद क्रान्तिकारीयो को इनका सम्मान दिलाने के लिए किसी ने भी कदम नही बढाया। बल्की कंही नाम दबाया गया तो कंही इनके नाम की जगह सिर्फ जनता बोलकर दो शब्द मे ही किस्सा खत्म करदिया।









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